Friday, June 24, 2016

ये समझदारी भी किस काम की हे यहा !

ये समझदारी भी किस काम की हे यहा,
बडा ही अज़ान ओर असमझ सा रास्ता हे मेरा !!!
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चलने का जून्ँन हे अभी भी मुझमे रास्तो की खबर कहा,
अब तो सिर्फ़ चाह रुककर थमकर बेठने की किसी ठिकाने पर,


अजीब सी कशमकश हे ज़िदगी के इस दोर मे यहा,
वही निगाहे वही अपनापन ओर ज़िदगी फिर मुकम्मएल निशाने पर,

हमसे क्या पूछते हे हम क्या हे हम क्या थे,
सिर्फ़ मकसद ओर बचा यही सवाल हे यहा क्या जमाने पर,

जानता हू खवाब ओर हकी कत के हर एक वक्त को,
ये जवानी हे ,,वो बचपना था जो निकल गया यू बहलाने पर,

जाना हे अगर भूला सको तो भुला दो सबसे नफरत.
यू बड़ा आसान सी ज़िदगी होगी गुजर जाये हसने हसाने पर
p@W@n

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