Wednesday, February 22, 2017

मिजाज ये समझा वो आज ज़िदगी का

मुसाफिर ने शहर बदला था एक उम्मीद मे,
पर देखो ये शहर ओर भी तन्हा निकला !!!!!!!!!!!!
...........................................................
उम्मीद थी आसमा पाने की हरदम,
देखो ये करवा कहा से कहा निकला,


मुशिक्ल यहा होना लाजमी था,
जिसके दरमियना खवहिश का दोर बेपनहा निकला,

सोचा था उसने आज वक्त मेरे साथ हे ,
पर यहा उस मुजरिम का बदला हुआ गवाह निकला

मिजाज ये समझा वो आज ज़िदगी का,
ज्यादा ही समझना ज़िदगी को यहा अब गुनाह निकला

No comments:

Post a Comment